विश्व पृथ्वी दिवस २०१७

शुभम चैरिटेबल एसोसिएशन ने मनाया विश्व वसुंधरा दिवस किए गए वृक्षारोपण 
इसके साथ ही शुभम टीम ने अपनी मुख्य सलाहकार श्रीमती श्रधा गोयल जी को फेयरवेल पार्टी दी.

शिलोंग, 24 अप्रैल ( पू. सं. ) ।   शुभम चैरिटेबल एसोसिएशन ने विश्व वसुंधरा दिवस के उपलक्ष्य में यहां शिलोंग रिलबंग स्थित अपने केंद्र में विशेष कार्यक्रम आयोजित किया। एसोसिएशन की अध्यक्ष पुष्पा बजाज की उपस्थिति में तिलोत्मा अग्रवाला व राधिका देवरा द्वारा प्रायोजित  'धरती को रहने दो हरी - भरी' विषय पर कार्यक्रम आधारित था। इस मौके पर धरती को बचाए रखने के उपायों तथा पर्यावरण संरक्षण से संवंधित जानकारी दी गई। इसके अलावा केंद्र प्रांगण में वृक्षारोपण किया गया। जिसमे केंद्र से जुड़े सदस्य व प्रशिक्षण ले रहे छात्रों ने भाग लिए। केंद्र की मुख्य सलाहकार श्रद्धा गोयल जो अब शिलोंग छोड़कर लखनऊ जा रही। लिहाज़ा उनके सम्मान में विदाई समारोह का भी आयोजन हुआ। श्रद्धा गोयल को पुष्प भेंट कर सम्मानित किया। शुभम चैरिटेबल एसोसिएशन एवं शुभम कौशल विकास केंद्र की अध्यक्ष पुष्पा बजाज ने अपने भाषण में कहा कि वह जब जब शुभम को जरूरत हुई श्रद्धा गोयल का साथ मिला। केंद्र को व्यवस्थित करने तथा कंप्यूटर प्रशिक्षण प्रोग्राम को सुचारु बनाने में विशेष सहयोग प्राप्त हुआ। उनके ( श्रद्धा गोयल ) इस सहयोग को हमेशा याद किया जाएगा। वहीं श्रद्धा गोयल ने अपने वक्तव्य में शिलोंग में मिले प्यार, आदर व सत्कार को कभी न भुलने की बात कही। शुभम कौशल विकास केंद्र में महज एक साल अपना समय दिया लेकिन उन्हें यहां से जो कुछ मिला उसे सहज व्यक्त करना मुश्किल है। महिला सशक्तिकरण पर केंद्र द्वारा जारी प्रयास शिलोंग से निकलकर आगे लखनऊ तक भी विस्तार हो इस दिशा में कदम बढ़ाने की ज़रूरत बताया। कार्यक्रम में एक वेबसाइट (saveuorgreenery.blogspot.com ) का भी लांचिंग किया गया। उक्त वेबसाइट के माध्यम से लोग अपने विचार व्यक्त कर सकते है। कविता, लेख आदि पोस्ट कर सकते है। केंद्र से संवंधित तमाम जानकारी व फोटो अपडेट रहेंगे। कार्यक्रम में कई लोगो ने गीत प्रस्तुत किए। 



































विश्व वसुंधरा दिवस






Project In Charge

Tilotama Agarwal 


Radhika Deorah 





विश्व वसुंधरा दिवस २०१७

  1.  पृथ्वी का एक दिन 23 घंटे 56 मिनट और 4.091 सेकेंड का होता है।
  2. पृथ्वी का घनफल एक ट्रिलीयन घन किमी है। क्या आप 1000 मीटर ऊँचे , 1000 मीटर लम्बे, 1000 मीटर चौड़े घन की कल्पना कर सकते है? अब ऐसे एक ट्रिलीयन घन की कल्पना किजीये, वह पृथ्वी है!
  3. पृथ्वी का द्रव्यमान 6,000,000,000,000,000,000,000,000 किलो है।
  4.  पृथ्वी पूरी तरह से गोल नहीं है। घू्र्णन से ध्रुवों पर चपटी है। ध्रुवों से व्यास 12,713.6 किमी (7882.4 मील) है लेकिन विषुवत पर 12,756.2 किमी (7908.8 मील ) है। दोनो में अंतर 43 किमी का है, जो 0.3 प्रतिशत है, यह ज़्यादा नहीं है लेकिन है।
  5. पृथ्वी थोड़ी चपटी तो है लेकिन सूर्य और चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण उसे और चपटा करते है जिसे हम ज्वार भाटा कहते हैं। जीहाँ यह प्रभाव सागर पर लगभग एक मीटर का होता है लेकिन ठोस ज़मीन पर भी यह आधा मीटर होता है।
  6.  ऐसी कोई जगह नहीं है जहाँ पृथ्वी का वातावरण समाप्त हो कर अंतरिक्ष प्रारभ होता है। वातावरण उंचाई के साथ पतला होता जाता है। आधिकारिक रूप से 100 किमी ऊँचाई पर अंतरिक्ष प्रारंभ माना जाता है जिसे कारमन रेखा कहते है। इस ऊँचाई पार करने वाले को अंतरिक्ष यात्री कहा जाता है।
  7. चंद्रमा का व्यास पृथ्वी का एक चौथाई है, जो उसे मातृ ग्रह की तुलना में सबसे बड़ा उपग्रह बनाता है। वैसे शेरान जो प्लूटो का सबसे बड़ा उपग्रह है, प्लूटो के व्यास के आधे से ज़्यादा व्यास का है। लेकिन अब प्लूटो ग्रह नहीं है, इसलिये चंद्रमा विजेता है!
  8. चंद्रमा आपकी कल्पना ज़्यादा दूर है। यदि हम पृथ्वी बास्केटबाल की गेंद माने तो चंद्रमा 7.4 मीटर दूरी पर एक टेनिस की गेंद है।
  9. पृथ्वी का वातावरण विद्युत चुंबकिय विकिरण के एक छोटे भाग को ही पार होने देता है जिसे हम प्रकाश कहते है, अन्य मुख्य भाग जैसे अवरक्त , पराबैंगनी, क्ष किरण और गामा किरण रोक दी जाती है। यह सब ख़तरनाक विकिरण है, अन्यथा जीवन संभव नहीं था।
  10. पृथ्वी गरम हो रही है और यह एक तथ्य है।
  11. पृथ्वी पर 200 से कम उल्कापात से बने क्रेटर है, जबकि चंद्रमा पर वे अरबों में है। पृथ्वी के कई क्रेटर हवा पानी से नष्ट हो चुके है और वे करोड़ों वर्ष पूराने है जबकि चंद्रमा पर वे नये है।
  12. एक क्षुद्रग्रह 2010 TKपृथ्वी की कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करता है लेकिन वह कभी पृथ्वी के क़रीब नहीं आयेगा। वह 300 मीटर लंबा है।
  13. पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा एक दीर्घ वृत्त में करती है। पृथ्वी सूर्य की सबसे समिपस्थ स्थिति में 147.1 मिलियन किमी (91.3 मिलियन मील) तथा दूरस्थ स्थिति 152.1 मिलियन किमी (94.3 मिलियन मील ) दूर होती है।
  14.  यदि आप पृथ्वी के समस्त पानी की एक बुँद बनाये तो वह 1400 किमी (860 मील ) व्यास मात्र की ही होगी।
  15.  पृथ्वी के वातावरण का वज़न 5000 ट्रिलीयन टन है।
  16.  पृथ्वी अब तक का ज्ञात इकलौता ग्रह है जिसपर जीवन है!

भारत में प्रदूषण

भारत में प्रदूषण
वायु प्रदूषण
शहरीकरण और औद्योगिकीकरण से भारत की वायु गुणता में अत्यधिक कमी आयी है। विश्वभर में 30 लाख मौतें, घर और बाहर के वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष होती हैं, इनमें से सबसे ज्यादा भारत में होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत की राजधानी दिल्ली, विश्व के 10 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में से एक है। सर्वेक्षण बताते हैं कि वायु प्रदूषण से देश में, प्रतिवर्ष होने वाली मौतों के औसत से, दिल्ली में 12 प्रतिषत अधिक मृत्यु होती है।
एक अलग अध्ययन के अनुसार, भारत का सकल घरेलू उत्पाद पिछले दो दषकों में 2.5 प्रतिषत बढ़ा है, वाहनों से होने वाला प्रदूषण 8 प्रतिषत बढ़ा है जबकि उद्योगों से बढ़ने वाला प्रदूषण चौगुना हो गया है। भारत के प्रदूषणों में वायु प्रदूषण सबसे अधिक गम्भीर समस्या है। यह कई रूपों में हो रहा है जैसे- वाहनों से निकलने वाला धुऑं, उद्योगों से अषोधित औद्योगिक धुऑं, औद्योगिकीकरण के अतिरिक्त बढ़ते शहरीकरण से नये-नये औद्योगिक केन्द्र खुल गये हैं पर उनके लिए आवश्यक नागरिक सुविधाओं तथा प्रदूषण नियंत्रण के तरीकों का विस्तार नहीं हुआ है।

वायु प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक प्रावधानों को दिल्ली जैसे शहर में पूर्णरूपेण लागू कर पाना काफी मुश्किल कार्य है। फिर भी इस दिशा में कार्य जारी है। विशेष रूप से सी.एन.जी. गैस के प्रयोग ने, इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है पर भविष्य में वाहनों की संख्या के लगातार बढ़ने की सम्भावना से, जुड़े हुए सरकारी प्रयासों की तथा प्रदूषण नियंत्रण प्रावधानों को कठोरता से लागू करने की आवश्यकता है।
पानी का प्रदूषण तथा बर्बादी
पानी के प्रदूषण के कई स्रोत हैं। सबसे अधिक प्रदूषण शहरों की नालियों तथा उद्योगों के कचरे का, नदियों में प्रवाह से फैलता है। वर्तमान में इसमें से केवल 16 प्रतिषत को ही शोधित किया जाता है और यही नदियों का जल अन्तत: हमारे घरों में पीने के लिए भेज दिया जाता है। जो कि अत्यधिक दूषित तथा बीमारी उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं से भरा होता है। कृषि मैदानों से निकलने वाले कूड़े-कचरे को भी, नदियों में डाल दिया जाता है इसमें खतरनाक रसायन तथा कीटनाषक, पानी में पहुँच जाते हैं।
पिछले पचास वर्षों में उद्योगों का निरन्तर विस्तार हुआ है। कुछ उद्योगों में जल प्रदूषण, जैविक प्रदूषक तथा जहरीले कचरे के रूप में अधिक सघन है। खाद्य उत्पाद तथा औद्योगिक रसायन बनाने वाले, उद्योगों में यह ज्यादा पाया जाता है। वास्तविकता यह है कि ''गंगा क्रिया योजना'' के अन्तर्गत पड़ने वाले अधिक से अधिक उद्योगों के जल शोधित यंत्र नहीं लगे हैं। बड़े उद्योगों ने तो अपने औद्योगिक कचरे के निस्तारण के उपाय किये हैं पर छोटे तथा मध्यम दर्जे के उद्यागों ने इन पर होने वाले व्यय को देखते हुए, इसे नहीं अपनाया है। उनका लाभ की स्थिति में न होना या बहुत कम लाभ होना भी, इसमें बाधक है।

रासायनिक प्रदूषण
तेजी से विकसित हो रहे औद्योगिक देशों जैसे भारत में, स्थानीय जनता को प्रदूषण से होने वाले खतरों को अनदेखा कर दिया जाता है। भोपाल की गैस-त्रासदी इसका एक उदाहरण है।
रासायनिक प्रदूषण को पूरे देश में तेजी से अनुभव किया जा रहा है। यह पाया गया है कि गैर औद्योगिक क्षेत्रों की तुलना में, औद्योगिक क्षेत्रों में तरह-तरह के कैन्सर, विभिन्न त्वचा की बीमारियाँ, जन्मजात विकृतियों, आनुवांशिक असामनता भी लगतार बढ़ रही है, स्वाभाविक साँस लेने की, पाचन की, रक्त बहाव की, संक्रामक आदि बीमारियों में चौगुना बढ़ोत्तरी हुयी है।
भारत सकरार की 'नेशनल जियाफिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी' के सर्वेक्षण के अनुसार, 1970 के दशक के साथ ही औद्योगिकीकरण ने भारत के शान्त मैदानों, झीलों, झरनों का परिदृश्य बदल दिया है जहरीले भारी रासायनिक तत्वों से धरती के अन्दर का जल, निरन्तर प्रभावित हो रहा है।

वोट दीजिये : पेड़ काटे जा रहे हैं, लगाए नहीं जा रहे! कब तक चलेगा?



Author: 
रविशंकर रवि
डिब्रूगढ़ के जयपुर वर्षा वन के अंदर नदी को बांधकर पनबिजली परियोजना बनाने की तैयारी चल रही है। यदि वहां पर पानी के बहाव को रोका गया तो जमा पानी नए इलाके में पसर जाएगा। नीचे के इलाके में नदी का पानी गर्मी के दिनों में नहीं जाएगा तो वन्यजीवों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। वर्षा वन के कई वन्यजीव घने जंगल के बाहर नहीं आते हैं। वैसे जीवों को बचाना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए वर्षा वन को विकास से दूर रखना जरूरी है।
असम के वन एवं पर्यावरण मंत्री रकीबुल हुसैन यह मानने को भले ही तैयार न हों कि असम में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई जारी है, लेकिन असलियत यही है कि पूरे राज्य में अवैध रूप से रोजाना हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं। वे यह जरूर मानते हैं कि सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने और ईस्ट-वेस्ट कॉरीडोर के निर्माण के लिए पेड़ों को काटने की मजबूरी थी। विकास योजनाओं के लिए कितने पेड़ काटे गए इसका सही आंकड़ा उन्हें पता नहीं था, लेकिन यह दावा जरूर करते रहे कि जितने पेड़ काटे गए हैं, उनसे पांच गुणा अधिक पौधे लगाए गए हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और है। गुवाहाटी से करीब के भी संरक्षित वन क्षेत्र लकड़ी माफियाओं तथा अतिक्रमणकारियों के कब्जे में हैं।

इसके चलते इन वन क्षेत्रों में पाए जाने वाले मूल्यवान शाल, सागौन आदि वृक्षों का अस्तित्व संकट में हैं। पश्चिम कामरूप के कुलसी संरक्षित वनांचल से मूल्यवान पेड़ों का तकरीबन सफाया ही कर दिया गया है। कुछ दिनों पूर्व वन मंत्री रकीबुल हुसैन ने कुलसी में एक वृक्षारोपण कार्यक्रम में हिस्सा लेकर कुलसी के पेड़ों के संरक्षण का आह्वान किया था, लेकिन मंत्री के इस आह्वान को नकारते हुए निखिल राभा छात्र संघ की छयगांव, लोहारघाट आदि आंचलिक समितियों ने आरोप लगाया कि बड़े पैमाने पर एक सौ वर्ष से अधिक पुराने सागौन के पेड़ों को काटा जा रहा है। पहाड़ी इलाकों में चलाई जा रहीं अवैध आरा मिलों में इनकी सबसे ज्यादा मांग है। यहां इनकी कटाई कर गुवाहाटी भेजा जाता है। नदियों के किनारे अवैध खनन के कारण कामरूप जिले का पुराना शहर पलासबाड़ी ब्रह्मपुत्र में समा चुका है।

नए बसाए गए विजय नगर पर भी कटाव का खतरा मंडरा रहा है। रिको नदी से रेत निकालने का परमिट वन विभाग ने दिया है। नियम से किनारे से काफी दूर जाकर रेत उठाया जाना है। लेकिन ठेकेदार नदी के किनारे खुदाई करवाते हैं। इस वजह से किनारे की सख्त मिट्टी भी कट जाती है और बरसात में बाढ़ का पानी नदी के किनारे को काटता जाता है। वन एवं वन्यजीवों पर काम कर रहे स्वयंसेवी संगठन अरण्यक के जयंत तालुकदार का कहना है कि गैर जरूरी विकास योजनाओं की वजह से वर्षा वन के अस्तित्व को खतरा है। डिब्रूगढ़ के जयपुर वर्षा वन के अंदर नदी को बांधकर पनबिजली परियोजना बनाने की तैयारी चल रही है। यदि वहां पर पानी के बहाव को रोका गया तो जमा पानी नए इलाके में पसर जाएगा। नीचे के इलाके में नदी का पानी गर्मी के दिनों में नहीं जाएगा तो वन्यजीवों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। वर्षा वन के कई वन्यजीव घने जंगल के बाहर नहीं आते हैं। वैसे जीवों को बचाना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए वर्षा वन को विकास से दूर रखना जरूरी है।

स्वयंसेवी संगठन सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काटे जा रहे पहाड़ और पेड़ों से चिंतित हैं। वह चाहते हैं कि विकास के लिए पेड़ काटा जाए लेकिन सड़क बनने के बाद दोनों किनारों पर बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाए ताकि बारिश के पानी के साथ मिट्टी के क्षरण को रोका जा सके। पहाड़ और पेड़ की कटाई के साथ नए पौधे लगाने से वे कुछ वर्षों में बड़े होकर मिट्टी के कटाव को रोक पाएंगे और सड़क किनारे छांव भी मिलेगी। पहाड़ भी नंगे होने से बच जाएंगे। लेकिन इस तरह की कोई योजना नहीं है। जिसके परिणामस्वरूप पहाड़ की मिट्टी सड़कों पर गिरती रहेगी और भूस्खलन से सड़कें कटती रहेंगी।

इस खबर के स्रोत का लिंक: 
नई दुनिया

पेड़ बचाओ अभियान को बनाओ जन आंदोलन

आज सारी दुनिया ग्लोवल वार्मिंग से चिंतित है, प्रकृति का अन्धा धुन्ध दोहन करने से यह समस्या विकराल हो गई है और देश व्यापी सूखा, सुनामी, रेगिस्तान में बाढ, प्राकृतिक प्रकोप आदि इसके परिणाम सामने आने लगे हैं। 
समय रहते सुधारात्मक प्रयास नहीं किए गए तो आने वाली पीढी हमें माफ नहीं करेगी। 

आइये हम प्रकृति की सुरक्षा के लिए एक जुट हो जाएँ!
अगर आप हमारे साथ हैं तो हमें वोट दीजिये !

हार न जाना काल चक्र से

बीता वर्ष बीतीं बातें,
चलता चल तू यूँ ही बन्दे !
जीवन है यह भूल न जाना,
हौंसला रखना यूँ ही बन्दे !

कदम उठाना यह सोच कर तू ,
दिल को समझाना यह सोच कर तू!
सफ़र तेरा चलेगा तब तक,

खुद को अकेला समझेगा जब तक !!

बांध के मुठी में शक्ति अपनी,
विवेक बुधि सहेज के अपनी!
निरंतर विजेता बनने को तू ,
दुनिया कहेगी तेरी कहानी !!

ताप मिले या मिले अन्धेरें,
र रुकना तू न थकना तू !
दिन दिखी गर मिले कहीं तो,
उनकी धुल ले लेना तू !!

उनकी दुवा तेरी साथी होगी,
उनकी ममता तेरी तपश हरेगी!
मंजिल  से पहले  लौट  न आना ,
स्वर्णिम जीत तेरा स्वागत करेगी !!

हार न जाना काल चक्र से
यूँ ही चलते  रहना मुसाफिर !
यूँ ही चलते  रहना मुसाफिर !

दीपक एक जलाना साथी

दीपक एक जलाना साथी

गुमसुम बैठ न जाना साथी!
दीपक एक जलाना साथी!!

सघन कालिमा जाल बिछाए
द्वार-देहरी नज़र न आए
घर की राह दिखाना साथी!
दीपक एक जलाना साथी

घर औ' बाहर लीप-पोतकर
कोने-आंतर झाड़-झूड़कर
मन का मैल छुड़ाना साथी!
दीपक एक जलाना साथी!!

एक हमारा, एक तुम्हारा
दीप जले, चमके चौबारा
मिल-जुल पर्व मनाना साथी!
दीपक एक जलाना साथी!!

आ सकता है कोई झोंका
क्योंकि हवा को किसने रोका?
दोनों हाथ लगाना साथी!
दीपक एक जलाना साथी!

शुभ दीपावली

पर्यावरण मामलों की सुनवाई

भारत राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण व्यवस्था शुरू कर दुनिया में ऐसा तीसरा देश बन गया है, जहाँ पर्यावरण मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें चलती हैं।

उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश लोकेश्वरसिंह पंता को न्यायाधिकरण का पहला अध्यक्ष बनाया गया है और उन्होंने पदभार संभाल लिया है। इस न्यायाधिकरण की चार क्षेत्रीय पीठ होंगी।

न्यायाधिकरण के अस्तित्व में आने के साथ राष्ट्रीय पर्यावरण अपीली प्राधिकार अस्तित्व में नहीं रह जाएगा तथा उसके समक्ष के सारे मामले नए संस्था को स्थानांतरित कर दिया गया है।

इस न्यायाधिकरण की स्थापना राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण कानून के तहत किया गया है जिस कानून को इस वर्ष के आरंभ में संसद के द्वारा पारित किया गया था।

इस न्यायाधिकरण में पर्यावरण के विभिन्न क्षेत्रों और संबंधित विज्ञान क्षेत्रों के विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। इस न्यायाधिकरण को पर्यावरण के मसलों की अनदेखी किए जाने पर संबंधित पक्षों को मुआवजा दिलाने और किए गए नुकसान के लिए पुनर्स्थापना करने के लिए निर्देश जारी करने के लिए अधिकृत किया गया है।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बताया कि यह अपने प्रकार की अलग संस्था है, जिसमें ‘प्रदूषण करने वाले नुकसान की भरपाई करें तथा ठोस विकास’ के सिद्धांत को अपनाया गया है। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति नागरिक क्षतिपूर्ति का दावा करने के लिए न्यायाधिकरण को संपर्क कर सकता है जो पर्यावरण कानूनों को अपर्याप्त तरीके से लागू करने के कारण उत्पन्न होता है।

भारत से पहले ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड ही केवल दो देश हैं, जिनके पास पर्यावरण संबंधी मसलों के निपटारे के लिए विशेष अदालत है। पिछले वर्ष अप्रैल में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के पद से अवकाश ग्रहण करने वाले पंता ने कहा कि उन्हें जो जिम्मेदारी सौंपी गई है, उसे पूरा करने की कोशिश करने का उनका प्रयास होगा।

इस न्यायाधिकरण में 20 सदस्य होंगे जिसमें 10 न्यायापालिका क्षेत्र के और 10 सदस्य पर्यावरण के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ होंगे। (भाषा)

जल

उपयोग किए जाने लायक करीब एक तिहाई पानी के व्यर्थ जाने पर चिंता जताते हुए संसद की एक स्थायी समिति ने बाँधों के निर्माण के संदर्भ में राष्ट्रीय पर्यावरण नीति पर दोबारा विचार किए जाने की सिफारिश की है।

जल संसाधन पर संसद की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की बड़ी परियोजनाओं के लिए पर्यावरण संबंधी मंजूरी के प्रावधानों में संशोधन का सुझाव दिया है। बहरहाल राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006 में इन सुझावों को शामिल नहीं किया गया है।

समिति की रिपोर्ट लोकसभा में पेश की गई। इसमें कहा गया है कि जलसंग्रह क्षमता बढ़ाने के लिए मंत्रालय के सुझाव पर पर्यावरण की दृष्टि से दोबारा विचार करना जरूरी है क्योंकि एक तिहाई उपयोगी पानी समुद्र में व्यर्थ चला जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार जल संसाधन मंत्रालय राष्ट्रीय पर्यावरण नीति में संशोधन के लिए इस पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के साथ मिलकर विचार कर सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि 11वीं पंचवर्षीय योजना में 60 करोड़ हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता हासिल करने के लिए 97 750 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।

वर्तमान संग्रह क्षमता 71.70 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है। 11वीं पंचवर्षीय योजना में निर्माणाधीन परियोजनाओं से 30.57 बीसीएम की संग्रह क्षमता हासिल करने का प्रस्ताव है। विचाराधीन परियोजनाओं से 71.34 बीसीएम अतिरिक्त क्षमता हासिल की जा सकती है।

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ग्रीन हॉउस गैस कहाँ कहाँ से उत्सर्जित की ! कौन है दोषी ?
कौन देगा जबाब ?
कहाँ से होता है ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्ज
पॉवर स्टेशन से - 21.3 प्रतिशत
इंडस्ट्री से - 16.8 प्रतिशत
यातायात और गाड़ियों से - 14 प्रतिशत
खेती-किसानी के उत्पादों से - 12.5 प्रतिशत
जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल से - 11.3 प्रतिशत
रहवासी क्षेत्रों से - 10.3 प्रतिशत
बॉयोमॉस जलने से - 10 प्रतिशत
कचरा जलाने से - 3.4 प्रतिशत
कैसे करोगे अपनी धरती को हारी भरी ?



खतरा है : हमने टेलीविजन के माध्यम से संसार में ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बढ़ रहे खतरों को देखा है। आर्कटिक में पिघलती हुई बर्फ, चटकते ग्लेशियर, अमेरिका में भयंकर तूफानों की आमद बता रही है कि हम 'मौसम परिवर्तन' के दौर से गुजर रहे हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि इसका असर सिर्फ समुद्र तटीय इलाकों पर ही नहीं पड़ेगा बल्कि सभी जगह पड़ेगा।


माना जा रहा है कि इसकी वजह से उष्णकटिबंधीय रेगिस्तानों में नमी बढ़ेगी। मैदानी इलाकों में भी इतनी गर्मी पड़ेगी जितनी कभी इतिहास में नहीं पड़ी। इस वजह से विभिन्न प्रकार की जानलेवा बीमारियाँ पैदा होंगी। वैज्ञानिकों के अनुसार आज के 15.5 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान के मुकाबले भविष्य में 22 डिग्री सेंटीग्रेट तक तापमान जा सकता है।


हमें ध्यान रखना होगा कि हम प्रकृति को इतना नाराज नहीं कर दें कि वह हमारे अस्तित्व को खत्म करने पर ही आमादा हो जाए। हमें उसे मनाकर रखना पड़ेगा। हमें उसका ख्याल रखना पड़ेगा, तभी तो वह हमारा ख्याल रखेगी।


वोट दीजिये

पेड़  पौधों को काटने का अभियान
आज भी जारी है 
यह एक जघन्य पाप है 
अगर आप भी ऐसा मानते हैं 
तो शामिल  होइए  हमारे साथ!
 हमें  वोट दीजिये !